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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
विरथा रथिनो राजन्समासाद्य परस्परम् |  १८   क
केषेशु समसज्जन्त कवचेषु भुजेषु च ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति