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अनुशासन पर्व
अध्याय ४४
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भीष्म उवाच
पाणिग्रहीता चान्यः स्यादत्र नो धर्मसंशय़ः |  ४८   क
तन्नश्छिन्धि महाप्राज्ञ त्वं हि वै प्राज्ञसंमतः |  ४८   ख
तत्त्वं जिज्ञासमानानां चक्षुर्भवतु नो भवान् ||  ४८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति