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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
भ्राजमानं श्रिय़ा युक्तं ज्वलन्तमिव तेजसा |  २३   क
द्रोणं दृष्ट्वारय़स्त्रेसुश्चेलुर्मम्लुश्च मारिष ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति