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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
पाञ्चालास्तु विशेषेण द्रोणसाय़कपीडिताः |  २८   क
समसज्जन्त राजेन्द्र समरे भृशवेदनाः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति