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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
ततो विराटद्रुपदौ द्रोणं प्रतिय़यू रणे |  २९   क
तथा चरन्तं सङ्ग्रामे भृशं समरदुर्जय़म् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति