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वन पर्व
अध्याय १७०
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अर्जुन उवाच
तथा पतत्रिभिर्दिव्यैरुपेतं सुमनोहरैः |  ४   क
असुरैर्नित्यमुदितैः शूलर्ष्टिमुसलाय़ुधैः |  ४   ख
चापमुद्गरहस्तैश्च स्रग्विभिः सर्वतो वृतम् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति