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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्य कर्म तद्दृष्ट्वा कोपदुःखसमन्वितः |  ३६   क
शशाप रथिनां मध्ये धृष्टद्युम्नो महामनाः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति