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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
इष्टापूर्तात्तथा क्षात्राद्व्राह्मण्याच्च स नश्यतु |  ३७   क
द्रोणो यस्याद्य मुच्येत यो वा द्रोणात्पराङ्मुखः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति