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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
रक्ष्यमाणं तथा द्रोणं समरे तैर्महात्मभिः |  ४०   क
यतमानापि पाञ्चाला न शेकुः प्रतिवीक्षितुम् ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति