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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
केचिदन्यत्र गच्छन्तः पथि चान्यैरुपद्रुताः |  ५०   क
विमुखाः पृष्ठतश्चान्ये ताड्यन्ते पार्श्वतोऽपरे ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति