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द्रोण पर्व
अध्याय १६१
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सञ्जय़ उवाच
तथा संसक्तय़ुद्धं तदभवद्भृशदारुणम् |  ५१   क
अथ सन्ध्यागतः सूर्यः क्षणेन समपद्यत ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति