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आदि पर्व
अध्याय १६२
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गन्धर्व उवाच
सहस्रांशुं ततो विप्रः कृताञ्जलिरुपस्थितः |  १७   क
वसिष्ठोऽहमिति प्रीत्या स चात्मानं न्यवेदय़त् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति