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द्रोण पर्व
अध्याय १३३
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सञ्जय़ उवाच
समागमः पाण्डुसुतैर्दृष्टस्ते वहुशो युधि |  १५   क
सर्वत्र निर्जितश्चासि पाण्डवैः सूतनन्दन ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति