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शान्ति पर्व
अध्याय १६२
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भीष्म उवाच
ईदृशैः पुरुषश्रेष्ठैः सन्धिं यः कुरुते नृपः |  २४   क
तस्य विस्तीर्यते राष्ट्रं ज्योत्स्ना ग्रहपतेरिव ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति