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वन पर्व
अध्याय ११७
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अकृतव्रण उवाच
स तेषु तर्पय़ामास पितॄन्भृगुकुलोद्वहः |  १०   क
साक्षाद्ददर्श चर्चीकं स च रामं न्यवारय़त् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति