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शान्ति पर्व
अध्याय १६२
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भीष्म उवाच
सर्वतः पापदर्शी च नास्तिको वेदनिन्दकः |  ८   क
सम्प्रकीर्णेन्द्रिय़ो लोके यः कामनिरतश्चरेत् ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति