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वन पर्व
अध्याय १६२
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वैशम्पाय़न उवाच
जटिलं देवराजस्य तपोय़ुक्तमकल्मषम् |  १०   क
हर्षेण महताविष्टः फल्गुनस्याथ दर्शनात् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति