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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
इह कृत्वा तपो घोरं देहं संन्यस्य मानवाः |  १५   क
देवत्वं यान्ति कल्याणि शृणु चेदं वचो मम ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति