वन पर्व  अध्याय १६२

वैशम्पाय़न उवाच

त्वमिमां पृथिवीं राजन्प्रशासिष्यसि पाण्डव |  १२   क
स्वस्ति प्राप्नुहि कौन्तेय़ काम्यकं पुनराश्रमम् ||  १२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति