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वन पर्व
अध्याय १६२
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वैशम्पाय़न उवाच
धनेश्वरगृहस्थानां पाण्डवानां समागमम् |  १५   क
शक्रेण य इमं विद्वानधीय़ीत समाहितः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति