वन पर्व  अध्याय १६२

वैशम्पाय़न उवाच

संवत्सरं व्रह्मचारी निय़तः संशितव्रतः |  १६   क
स जीवेत निरावाधः सुसुखी शरदां शतम् ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति