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द्रोण पर्व
अध्याय २८
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सञ्जय़ उवाच
निहत्य तं नरपतिमिन्द्रविक्रमं; सखाय़मिन्द्रस्य तथैन्द्रिराहवे |  ४४   क
ततोऽपरांस्तव जय़काङ्क्षिणो नरा; न्वभञ्ज वाय़ुर्वलवान्द्रुमानिव ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति