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शान्ति पर्व
अध्याय २२८
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व्यास उवाच
एतेषां चेदनुद्रष्टा पुरुषोऽपि सुदारुणः |  ५   क
यदि वा सर्ववेदज्ञो यदि वाप्यनृचोऽजपः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति