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उद्योग पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
सैक्यः कोशान्निःसरति प्रसन्नो; हित्वेव जीर्णामुरगस्त्वचं स्वाम् |  ९७   क
ध्वजे वाचो रौद्ररूपा वदन्ति; कदा रथो योक्ष्यते ते किरीटिन् ||  ९७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति