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उद्योग पर्व
अध्याय १६२
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दुर्योधन उवाच
किं पुनस्त्वय़ि दुर्धर्षे सेनापत्ये व्यवस्थिते |  १३   क
द्रोणे च पुरुषव्याघ्रे स्थिते युद्धाभिनन्दिनि ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति