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उद्योग पर्व
अध्याय १६२
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धृतराष्ट्र उवाच
हतमेव हि पश्यामि गाङ्गेय़ं पितरं रणे |  २   क
वासुदेवसहाय़ेन पार्थेन दृढधन्वना ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति