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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
सङ्क्षेपतो वै स विशुद्धकर्मा; तेभ्यः समाख्याय़ दिवि प्रवेशम् |  २९   क
माद्रीसुताभ्यां सहितः किरीटी; सुष्वाप तामावसतिं प्रतीतः ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति