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वन पर्व
अध्याय २६२
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मार्कण्डेय़ उवाच
अवमन्य स तत्सर्वं स्वरूपं प्रतिपद्य च |  ३२   क
सान्त्वय़ामास वैदेहीमिति राक्षसपुङ्गवः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति