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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
तेषु सर्वेष्वनीकेषु व्यतिषक्तेष्वनेकशः |  ११   क
स्वे स्वाञ्जघ्नुः परे स्वांश्च स्वे परांश्च परान्परे ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति