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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
वीरवाहुविसृष्टाश्च योधेषु च गजेषु च |  १२   क
असय़ः प्रत्यदृश्यन्त वाससां नेजनेष्विव ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति