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वन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स गुर्वीं यमदण्डकल्पां; महागदां काञ्चनपट्टनद्धाम् |  १५   क
प्रगृह्य तानभ्यपतत्तरस्वी; ततोऽव्रवीत्तिष्ठत तिष्ठतेति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति