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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
आविग्नमभवत्सर्वं कौरवाणां महद्वलम् |  २२   क
पाञ्चालानां च संसक्तं न प्राज्ञाय़त किञ्चन ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति