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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
न च दुःशासनं द्रौणिं न दुर्योधनसौवलौ |  २५   क
न कृपं मद्रराजं वा कृतवर्माणमेव च ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति