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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
सम्भ्रान्ते तुमुले घोरे रजोमेघे समुत्थिते |  २७   क
द्वितीय़ामिव सम्प्राप्ताममन्यन्त निशां तदा ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति