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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
उद्धूतत्वात्तु रजसः प्रसेकाच्छोणितस्य च |  ३०   क
प्रशशाम रजो भौमं शीघ्रत्वादनिलस्य च ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति