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शल्य पर्व
अध्याय ११
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सञ्जय़ उवाच
सशूलमिव हर्यक्षं वने मत्तमिव द्विपम् |  ३   क
जवेनाभ्यपतद्भीमः प्रगृह्य महतीं गदाम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति