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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
तद्घोरं महदाश्चर्यं सर्वे प्रैक्षन्समन्ततः |  ३४   क
रथर्षभाणामुग्राणां संनिपातममानुषम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति