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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
यतमानाः पराक्रान्ताः परस्परजिगीषवः |  ३६   क
जीमूता इव घर्मान्ते शरवर्षैरवाकिरन् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति