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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
स्पर्धिनस्ते महेष्वासाः कृतय़त्ना धनुर्धराः |  ३८   क
अभ्यगच्छंस्तथान्योन्यं मत्ता गजवृषा इव ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति