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उद्योग पर्व
अध्याय २८
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युधिष्ठिर उवाच
शैनेय़ा हि चैत्रकाश्चान्धकाश्च; वार्ष्णेय़भोजाः कौकुराः सृञ्जय़ाश्च |  ११   क
उपासीना वासुदेवस्य वुद्धिं; निगृह्य शत्रून्सुहृदो नन्दय़न्ति ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति