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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
रथैर्हय़ा हय़ैर्नागाः पादाताश्चापि कुञ्जरैः |  ४   क
हय़ा हय़ैः समाजग्मुः पादाताश्च पदातिभिः |  ४   ख
संसक्ताश्च विय़ुक्ताश्च योधाः संन्यपतन्रणे ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति