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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
चित्रैश्च विविधाकारैः शरीरावरणैरपि |  ४२   क
विचित्रैश्च रथैर्भग्नैर्हतैश्च गजवाजिभिः ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति