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द्रोण पर्व
अध्याय १३
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सञ्जय़ उवाच
लक्ष्मणः क्षत्रदेवेन विमर्दमकरोद्भृशम् |  ४४   क
यथा विष्णुः पुरा राजन्हिरण्याक्षेण संय़ुगे ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति