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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
ते रात्रौ कृतकर्माणः श्रान्ताः सूर्यस्य तेजसा |  ५   क
क्षुत्पिपासापरीताङ्गा विसञ्ज्ञा वहवोऽभवन् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति