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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
सर्वतो विनिवार्यैनं शरजालेन पीडय़न् |  ५१   क
विमुखं नकुलश्चक्रे तत्सैन्याः समपूजय़न् ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति