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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
तिष्ठ तिष्ठेति नकुलो वभाषे तनय़ं तव |  ५२   क
संस्मृत्य सर्वदुःखानि तव दुर्मन्त्रितेन च ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति