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द्रोण पर्व
अध्याय १६२
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सञ्जय़ उवाच
विवृद्धस्तुमुलः शव्दो द्यामगच्छन्महास्वनः |  ९   क
नानाय़ुधनिकृत्तानां चेष्टतामातुरः स्वनः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति