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शान्ति पर्व
अध्याय १६८
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व्राह्मण उवाच
न विभेति यदा चाय़ं यदा चास्मान्न विभ्यति |  ४२   क
यदा नेच्छति न द्वेष्टि व्रह्म सम्पद्यते तदा ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति