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आदि पर्व
अध्याय १६३
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गन्धर्व उवाच
ततः सर्वानवद्याग्नीं तपतीं तपनः स्वय़म् |  ५   क
ददौ संवरणस्यार्थे वसिष्ठाय़ महात्मने |  ५   ख
प्रतिजग्राह तां कन्यां महर्षिस्तपतीं तदा ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति