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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
उत्पत्तिवृद्धिक्षय़संनिपातै; र्न युज्यतेऽसौ परमः शरीरी |  १५   क
अनेन लिङ्गेन तु लिङ्गमन्य; द्गच्छत्यदृष्टः प्रतिसन्धिय़ोगात् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति